ढलती शाम

ढलती शाम घर चलिये , कर चलिये आराम ।
निशाचर की आहट से , नींद सोते हराम ।।

नींद सोते हराम , चोर उचक्के ही दिखे ।
लूट मार के यार , घूमते झूमते दिखे ।।

धर्म कर्म दुःख भान ,काम करिये सुख मिलती ।
मेहनत कर्म मान ,धाम चल सूरज ढलती।।
नवीन कुमार तिवारी

         

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