मृग तृष्णा

मोहक जाल मृगा तृष्णा,कर जाता लाचार ।
आरक्षण किये बिफरते, समानता अतिभार ।।

समानता अतिभार ,मुफ्त लड्डू फेंकते चले ।
करे जाति व्यापार , सत्ता सुख लग रहे भले ।।

विशेष पर अधिकार ,बनते वे देश तोड़क।
मोहक ये व्यभिचार ,अंध भक्ति लगे मोहक ।।
नवीन कुमार तिवारी,,

         

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