विरह 2

*विरह* 2

अस्त व्यस्त वे टहलते , दीखते शिकन भाल ।
बुद बुदाहट लब करते, घिसने लगते गाल ।।

घिसने लगते गाल ,तन बदन वसन भूलते ,
नैन हो रहे लाल , विचलित मन भटक चलते ।।

मन में लिये सवाल , होचले चाल पस्त।
पथ पथिक राह भटकते ,जीवन सूरज अस्त।।
*नवीनकुमार तिवारी,,*

         

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