लोग सह पाते नहीं हैं

लोग सह पाते नहीं हैं
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लोग सह पाते नहीं हैं दूसरों का प्यार ।
है इसी से नफरतों का हो रहा विस्तार ।।

दूर तक खामोशियों का गूंजता संगीत
खेलने से पूर्व ही सब मान लेते हार ।।

राह पथरीली बहुत है टीसते हैं घाव
क्या इसी से बैठ रहना हो गया स्वीकार ।।

दर्द के रिश्ते निभाना भी नहीं आसान
हो रहा शायद इसी से प्यार का व्यापार ।।

सख्तियों के सामने ही सब झुकाते शीश
चीटियां खुद ही उठाती दस गुना है भार ।।

लोभ की खातिर बिके हैं आचरण ईमान
ढूंढते हैं लोग फिर भी स्वार्थरत हो प्यार ।।

दूसरों को कष्ट दे कर सुख मनाते लोग
हो गया सीमित स्वयं में है अजब संसार ।।
———————–डॉ. रंजना वर्मा

         

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