कलम

मेरे दिल के अल्फाजों को कलम लिखती चली गई,
जैसा मेरे लफ़्ज़ों ने चाहा वैसे ही ढलती चली गई।

कभी खुशियॉ कभी ग़म की दास्तां लिखते लिखते,
अपने वजूद को भूल मुझमें ही समाती चली गई।
ज्ञ
लबों से जो नहीं कह पाई मोहब्बत की बातें…,
ज़ज्बातों में खो शब्द उकेरते हुए मुझे भिगाती चली गई।

समां बांधती रही कभी उनकी मुस्कराती नजरों से,
चांदनी रात में शीतल शीतल मुझे महकाती चली गई।

जानती हूं मैं कि तेरे अल्फाज मोहताज नहीं मेरे ,
लम्हा लम्हा मैं तुम में डूब संग बहकती चली गई।।।

डॉ राजमती पोखरना सुराना भीलवाडा राजस्थान

         

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