“मेरी माँ”…

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ज़िंदगी की ऊँची उड़ान में उजाला है मेरी माँ ।
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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दिन-ब-दिन खिलता रहा मैं तेरी ममता की छाँव में ,
तूने ही चलने की मजबूती दी मेरे पाँव में ।
अथक परिश्रम-गाथा , हाथों का छाला है मेरी माँ ,
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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तेरा किरदार ऐसा जिसमें जग की संपूर्णता ,
त्याग , पवित्रता , ममता और आशीष की बहुलता ।
तेरी छाँव तले हर कोई निराला है मेरी माँ ,
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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तेरी हाथों की रेखाएँ , उमर से बहुत बड़ी ,
मैंने देखा न कभी तेरे द्वारा कोई हड़बड़ी ।
एक सूत्र में सबको पिरोने वाली माला है मेरी माँ ,
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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रहूँ कैसा भी पर तेरे लिए बस सच्चा हूँ मैं ,
हो जाऊँ कितना भी बड़ा पर तेरा बच्चा हूँ मैं ।
क्या-क्या जतन करके “कृष्णा” को ढाला है मेरी माँ ?
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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ज़िंदगी की ऊँची उड़ान में उजाला है मेरी माँ ।
दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।।
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— °•K.S. PATEL•°
( 08/09/2018 )

         

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