समर्पण

मैं प्रतीक्षा कर, तुम्हारे,
इक प्यार की ही खुश रहूँगी।।

मैं तुम्हारे दर्द का ,
संसार लेकर खुश रहूँगी।
मैं तुम्हारे क्रोध का ,
अंगार लेकर खुश रहूँगी।।

मैं तुम्हे हर हाल में,
स्वीकार करके खुश रहूँगी।
मैं तुम्हारे प्यार को
प्रिय ! प्यार देकर खुश रहूँगीं।।

तुम मुझे हिय में बसाओ ,
या भुला दो तुम मुझे।
मैं तुम्हे मृदु प्यार का ,
मनुहार देकर खुश रहूँगीं।।
मैं प्रतीक्षा – – – – ।

तुम मुझे खुशियाँ दिखा दो,
या कि गम ही दो मुझे।
सुख व दुःख में साम्य का ,
संस्कार देकर खुश रहूँगीं।।
मैं प्रतीक्षा – – – -।

है असीमित प्यार मेरा ,
प्यार बस तेरे लिए।
मैं स्वयं पर तुम्हारा ,
अधिकार देकर खुश रहूँगीं।।
मैं प्रतीक्षा – – – – – ।

तुम मुझे अपना समझ लो ,
या कि बिसरा दो मुझे।
मैं तुम्हारे नेह को ,
विस्तार देकर खुश रहूँगीं।।
मैं प्रतीक्षा – – – – – – – -।

क्या धरा का इस गगन का,
नेह देखा है नहीं।
मैं तो बस उस नेह को ,
आकार देकर खुश रहूँगी।।
मैं प्रतीक्षा – – – – – – -।

है भला यह भी पता क्या,
इक क्षितिज भी है कहीं।
प्रकृति के इस न्यास को ,
श्रृंगार देकर खुश रहूँगीं।।
मैं प्रतीक्षा – – – – – – – ।

साथ दूँगीं मैं , सदा ही,
हर कदम हर राह पर।
मैं ‘अधर’ पर मधुर मृदु,
उपहार देकर खुश रहूँगी।।

मैं प्रतीक्षा कर तुम्हारे ।
इक प्यार की ही खुश रहूँगीं।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

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