कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार….

कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की,
बंद पलकों में सजाये ख्वाब निगाहें-ए-प्यार की।

रूठ वो किस बात पर हमें कोई अंदाजा न था,
बीत गयी सारी रात आंखों ही आंखों में यार की।

जिन्दगी का जिन्दगी से रहे राब्ता जीवन भर,
बरसा दो लफ्जों से प्यार जलधार की।

निगाहें फेर हमसे जीने का नजरिया बदल दिया,
कातिलाना निगाहें लगने लगी अपने सरकार की।

दोस्त ही करने लगे दोस्ती में छिप छिपकर वार,
नफरतों के गुबार लगे छाने बातें करते हो एतबार की‌।

डॉ राजमती पोखरना सुराना भीलवाडा राजस्थान

         

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