कहीं दो बूँद कहीं पर बाढ़ अजब बरखा तेरे उपहार

एक बरखा गीत
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कहीं दो बूँद कहीं पर बाढ़
अजब बरखा तेरे उपहार |
कहीं तू ओलों से दे मार
कहीं पर बरसे मूसलधार |
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कृषक जन सपने बोते हैं हमेशा तेरी आवक से |
अगर न आती तू दिन-रात गुज़रते जैसे पावक-से |
बहुत आशाएं भी सबकी टिकी रहतीं बारिश तुझ पर
मगर तू जिन पर है निर्भर दौड़ते रहते धावक-से |
गया आषाढ़ है प्यासा ही
किसानों को मत कर लाचार |
रोक कर इनको तू इस बार
दिखा दे कुछ तो बरखा प्यार |
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कहीं दो बूँद कहीं पर बाढ़
अजब बरखा तेरे उपहार |
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खिली बाँछें जब नभ पर देख तेरे वाहक हैं मँडराते |
भरोसा लेकिन तब होता नीर कुछ वे बरसा पाते |
खेल बिजली के संग उनका हम अक्सर देखा करते हैं
मगर तब होता है दुःख जब लौट कर रिक्त हैं वे जाते |
बरस नहीं पाए हैं बदरा
हुआ है ऐसा अनगिन बार |
नहीं करना ऐसा इस बार
लगाते तुझ से सतत गुहार |
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कहीं दो बूँद कहीं पर बाढ़
अजब बरखा तेरे उपहार |
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शहर में बरसे तू पल में भरे घुटनों तक यह पानी |
बजट हर साल मिले लेकिन प्रशासन करता मनमानी |
व्यवस्था ध्वस्त हुई इसमें तनिक भी दोष नहीं तेरा
कभी सुधरेगा मानव या करेगा यूँ ही नादानी |
बचानी हमको है हर बूँद
किया वादा बरखा इस बार |
मचाओ और न हाहाकार
यही बरखा तुझसे मनुहार |
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कहीं दो बूँद कहीं पर बाढ़
अजब बरखा तेरे उपहार |
कहीं तू ओलों से दे मार
कहीं पर बरसे मूसलधार |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |

         

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