अब गीत स्वयं के गाऊंगा

गाये गैरों के गीत बहुत
अब गीत स्वयं के गाऊंगा |
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मेरा भी मन क्या कहता है
लिख कर जग को बतलाऊँगा |
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भाषा छंदों का ज्ञान नहीं
मन उपजे भाव लिखे मैंने |
अपने हो या हो औरों के
केवल अहसास लिखे मैंने |
अनचाहे मेरे शब्दों में
दुख-दर्द ढले हैं अपनों के |
अनजाने में आधार बने
ये गीत सुहाने सपनों के |
सपने कैसे होते पूरे
यह अब सबको सिखलाऊंगा |
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गाये गैरों के गीत बहुत
अब गीत स्वयं के गाऊंगा |
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मेरी चाहत तो है कब से
कि जन जन गीत मेरे गाये |
सीधे दिल के जज्बात लिखूं
गहरे उतरें दिल छू जाये |
कोशिश रहती है गीतों पर
पड़े अलंकार की न छाया |
मुझे मोह तनिक न बिम्बों से
न भाये प्रतीकों की माया |
होंगे जितने ही शब्द सरल
मैं भाव सहज लिख पाऊंगा |
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गाये गैरों के गीत बहुत
अब गीत स्वयं के गाऊंगा |
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न ग़ालिब मीर ही बनना है
न बच्चन नीरज और दिनकर |
अपने शब्दों में गीत लिखूं
यह होगा सबसे श्रेयस्कर |
अनुगामी होना लक्ष्य नहीं
कुछ नया मुझे तो करना है |
दुनिया में अपने गीतों से
नव रंग मुझे बस भरना है |
मैं बन कबीर या तुलसी सम
सबके दिल में बस जाऊंगा |
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गाये गैरों के गीत बहुत
अब गीत स्वयं के गाऊंगा |
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मेरा भी मन क्या कहता है
लिख कर जग को बतलाऊँगा |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
06 /07 /2018

         

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