“फागुन आयो रे”…

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हर्ष-उल्लास , सुमधुर तरंगे , मन बहुत ललचाया ।
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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टेसू के मस्त पुष्प खिले प्रकृति के आँगन में ,
महुआ झूमे , रस टपकाए प्रकृति के दामन में ।
क्या खूब रंग-रूप अब मौसम का निखर आया ,
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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है महोत्सव फागुन का , मस्त हवा में प्रीत का ,
बैर होगा दूर , आनंद मिलेगा संगीत का ।
तन रंगेगा-मन रंगेगा , सबका जी हर्षाया ,
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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झाँझ-मृदंग की थाप , कहाँ फिर कोई संताप ?
ढोल बाजे मस्ती में , सुंदर लगे हर क्रिया-कलाप ।
छूटी शर्मो-हया , प्रेम आज जी भर के खिलखिलाया ,
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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कहे “कृष्णा” फागुन मास अनुपम छटा श्रृंगार है ,
अंतर्मन को महकाए , वो ख़ूबसूरत प्यार है ।
मंत्र-मुग्ध कर सभी को अमिट अहसास कराया ,
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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हर्ष-उल्लास , सुमधुर तरंगे , मन बहुत ललचाया ।
फागुन आया , राग रास-रंग साथ-साथ लाया ।।
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— °•K.S. PATEL•°
( 17/03/2019 )

         

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