भटक रहा है हृदय दिवाना

युगल चरण थक गये राह पर इतना अधिक चली
भटक रहा है हृदय दिवाना अब तक उसी गली ।।

टूट गयी पायल पाँवों की
घुंघरू बिखर गये
धुंधले हुए नयन पर सपने
कितने निखर गये ।

बिखरे पत्तों वाली मन को बंदनवार खली ।
भटक रहा है हृदय दिवाना अब तक उसी गली ।।

जगी जगी आँखों मे उलझी
उलझी भोर जगी ,
प्रणय प्रतीक्षा अमर हो गयी
कैसी लगन लगी ।

मोती जैसी बूँद अश्रु की दृग की कोर ढली ।
भटक रहा है हृदय दिवाना अब तक उसी गली ।।

स्वप्न स्वप्न ही होता है यह
सत्य नहीं जाना ,
रात्रि दिवस सम दुख सुख दोनों
यही नहीं माना ।

भानु पिया बिन खिल न सकेगी जीवन पद्म कली ।
भटक रहा है हृदय दिवाना अब तक उसी गली ।।

—————————  गीत – डॉ. रंजना वर्मा

         

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