अमर प्रेम

 

अनुपम है चिर नूतन न्यारा।
अमिट अमर प्रिय! प्रेम हमारा।।

रुदन हासमय गंध लिए मन,
दुर्गम पथ का कर अभिनन्दन।
मखत्राता मृत्युंजय बनकर,
कालवलय से लड़ता तनकर।।
कर विजित समर जीवन सारा।
रणबाँकुरा सुकोमल प्यारा।।

अनुपम है चिर नूतन न्यारा।
अमिट अमर प्रिय! प्रेम हमारा।।

त्रयताप नहीं मन की थाती,
न हुई मुमूर्ष जीवन – बाती।
निनादित हो गोधूलि बेला,
ज्यों पतझड़ भी हो अलबेला।।
दुखमय जीवन हँस स्वीकारा।
ऋतुराज अचम्भित है हारा।।

अनुपम है चिर नूतन न्यारा।
अमिट अमर प्रिय ! प्रेम हमारा।।

स्वप्न बुनेंगी अभिलाषाएँ,
स्वयंवरा हैं जिजीविषाएँ।
अतीत अत्याज्य अलौकिक है,
सदा अनागत ही मौलिक है।।
स्वयंसिद्ध अविरल जलधारा।
है ऐसा ही प्रेम हमारा।।

अनुपम है चिर नूतन न्यारा।
अमिट अमर प्रिय! प्रेम हमारा।।

इक प्राण ,सखे ! हैं दो तन में,
अन्य नहीं कोई चिन्तन में।
तुम हो तो तन है इस जग में,
झंझा दुर्दिन हैं सब पग में।।
हिय-दृग ने बस तुम्हे निहारा।
‘अधर’ खिले पा साथ तुम्हारा।।

अनुपम है चिर नूतन न्यारा।
अमिट अमर प्रिय ! प्रेम हमारा।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

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