उर में समाई हो

कुन्दकाली सी रूपवती तुम कुमुद सी मन को भायी हो
प्राची में पर्वत के पीछे वाली तुम अरुणाई हो
प्रतित्युत्तर में शरमाती हो हँसती हो इठलाती हो
तभी तो नयनों से होकर तुम उर में मेरे समायी हो

मृगनयनी से लोचन वाली , मुझको तुम सुखदायी हो
केशो में मेघों को बंधे , मुझ धरती पर छायी हो
मधु से मीठे वचन सुनकर बुलबुल बाले बोल बताकर
मेरे नयनों से होकर तुम उर में मेरे समायी हो

अधरों मे अपने रतिपति को साथी बंध के लायी हो
मनमथ सी मन मे तुम बसकर मंद मंद मुस्कायी हो
अधर के ऊपर खुभी की नेजा से जब वार किया मुझ पर
मेरे तब नयनों से होकर उर में मेरे समायी हो

झील सी लहराती आँखो से प्रियवर तुम हरषायी हो
वरि की लहरों सी लहराकर हौले से शरमायी हो
अधरों से तुम काम गिरती बालों से तुम रति को
तभी तो नयनों से होकर तुम , उर में मेरे समायी हो

हर पल साथी मुझको लगती सौरभ सी सुखदायी हो
मानो सावन ऋतु वाली तुम हर ओर हरीतिमा लायी हो
कली कली को कंचन करती कल्पवृक्ष की सुनजोहि
तभी तो नयनों से होकर तुम , उर में मेरे समायी हो

मौसम की मादकता तुझमें , सरसों सी हर्षायी हो
शब्दों की रूह में जाकर के , नया अर्थ ले आयी हो
तुझको पढ़कर तृप्त हुआ मन, काव्य सुधा पी मस्त हुआ
तभी तो नयनों से होकर तुम , उर में मेरे समायी हो

सागर से उठकर तुम प्रियवर , शोख घटा बन आई हो
धरती पर आकर तुम नदिया के उर में भी समायी हो
मुझ सागर से मिलने आने में, तुम हँसती हो बलखाती हो
तभी तो नयनों से होकर तुम उर में मेरे समायी हो

ऋषभ तोमर

         

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