“खोना चाहता हूँ”…

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प्रीत के धरातल पर ज़िंदगी का बीज बोना चाहता हूँ ।
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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अब और भटकने का गवाही ये मेरा मन नहीं देता ,
उमर के पड़ाव में हमेशा साथ मेरा तन नहीं देता ।
चाह लो एक बार , बस तेरे दिल में होना चाहता हूँ ,
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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माना कि ज़माने की ये दुश्वारियाँ भी कुछ कम नहीं है ,
मोहब्बत के अलावा भी यहाँ क्या और कुछ ग़म नहीं है ?
फिर भी एक बार तुमसे लिपटकर मैं रोना चाहता हूँ ,
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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कुछ तेरी मज़बूरी है तो कुछ मेरी भी मज़बूरी है ,
शायद यही वज़ह है कि हमारे दरम्यान कुछ दूरी है ।
इज़ाज़त हो तो रूसवाई का दाग धोना चाहता हूँ ,
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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अंतिम गुज़ारिश है अब तुम भी मुझे ज़ेहन में उतार लो ,
साँस न उखड़ जाए कहीं , उससे पहले मुझे स्वीकार लो ।
तेरी बाँहों में सकून की नींद ले सोना चाहता हूँ ,
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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प्रीत के धरातल पर ज़िंदगी का बीज बोना चाहता हूँ ।
पल का पहिया भले रूके , मैं तुझमें खोना चाहता हूँ ।।
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— K.S. PATEL
( 23/07/2018 )

         

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