चाँद को ज़मीं पर उतरते देखा है।

मैंने चाँद को आज ज़मीं पर उतरते देखा है।।
धीरे-धीरे अपने करीब से गुजरते देखा है।।

वो खूबसूरत था, उस पर दाग ना था।।
फूलों सी खुशबू, पर कोई बाग़ ना था।।
उसकी चमक ने, दूर अँधेरा कर दिया।।
रात में ही जैसे मानो सवेरा कर दिया।।

मेरे अन्दर के जज्बातों को उमड़ते देखा है।।
मैंने चाँद को आज ज़मीं पर उतरते देखा है।।

उसकी चांदनी चारों और बिखर रही थी।।
रात में उसकी खूबसूरती निखर रही थी।।
जैसे गर्मी में कोई ठण्डी हवा चल रही हो।।
बारिश की बूंदे पत्तों में फिसल रही हो।।

आज आसमां में बादलों को, घुमढ़ते देखा है।।
मैंने चाँद को आज ज़मीं पर उतरते देखा है।।

दूर कहीं जैसे, संगीत बज रहा था।।
जैसे कहीं कोई, महल सज रहा था।।
पलकें ना झुकी, मेरी एक बार को।।
देखते रही बस उसके ही श्रंगार को।।

किसी को पहली बार बनते संवरते देखा है।।
मैंने चाँद को आज ज़मीं पर उतरते देखा है।।

संदीप कुमार

         

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