जाने की अब न बातें करो

जाने की अब न बातें करो |
चंद लम्हात को तो रुको |
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जाने की अब न बातें करो |
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देर होती है तो होने दो अब सनम
ये बहाने सभी छोड़ दो |
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जाने की अब न बातें करो |
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दिन महीने बने और महीने बरस
फिर बरस एक लम्बी सदी में ढले |
है ख़ुदा की रज़ा आज यूँ यक ब यक
फिर से हम आ गए एक छत के तले |
वक़्त भी आज है मेहरबाँ
मुठ्ठियों में इसे भींच लो |
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जाने की अब न बातें करो |
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फिर पड़े हैं क़दम आपका है करम
दूरियाँ भी बनी आज नज़दीकियाँ |
याद फिर आ गई ज़िंदगी की घड़ी
जब हुई आपसे थी शनासाइयाँ |
इल्तजा है यही जानेजाँ
पांव अपने इधर रोक लो |
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जाने की अब न बातें करो |
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कट गया जो सफ़र आपके बिन सनम
ज़िंदगी से मुझे कुछ शिकायत नहीं |
जो बुरा वक़्त था याद करना उसे
आप तो जानते मेरी आदत नहीं |
किसलिए आज आह-ओ-फुगाँ
आप जो फिर मेरे साथ हो |
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जाने की अब न बातें करो |
चंद लम्हात को तो रुको |
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जाने की अब न बातें करो |
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देर होती है तो होने दो अब सनम
ये बहाने सभी छोड़ दो |
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जाने की अब न बातें करो |
जाने की अब न बातें करो |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
***06 /04 /2018
शब्दार्थ -यक ब यक =अचानक
शनासाइयाँ =जान पहचान
आह-ओ-फुगाँ=विलाप

         

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