तुम कह दो तो

गीत
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जीवन के इस लंबे पथ पर मन का साथ तुम्हारे पाया
आत्मा का सम्बंध किन्तु पथ का आयाम नहीं बन पाया ।।

पलक – पाँवड़े पड़े दृगों से
तेरी छवि उर – पुर में आयी,
तेरी पग – रज गंगा की
पावनता बन नयनों में छायी ।
स्नेह तृषित उर के ईरिण पर
आशा की फुहार बन बरसा –
किन्तु करूँ क्या आशा स्वर सुखमय संग्राम नहीं बन पाया ।
आत्मा का सम्बंध किन्तु पथ का आयाम नहीं बन पाया ।।

प्रश्नों के शत चिह्न
समस्याओं की वादी में भटकेंगे
अनुमानों प्रतिमानों से
पग पग पर उलझेंगे अटकेंगे ।
अमराई के बीच पपीहा
यदि जिज्ञासु पिपासु पुकारा –
बहलाने के हेतु उठे स्वर पथ विश्राम नहीं बन पाया ।
आत्मा का सम्बंध किन्तु पथ का आयाम नहीं बन पाया ।।

कभी श्रमिक गण मध्य मिलोगे
तुम थोड़ा शर्म दान करोगे
कभी भावनाओं की झिलमिल
में सम्बल प्रतिदान करोगे ।
अनुबंधों की अमित चाहना
वादों कसमों का स्वर होगी ,
किन्तु लगेगा मन तीरे अपना सुख – धाम नहीं बन पाया ।
आत्मा का सम्बंध किन्तु पथ का आयाम नहीं बन पाया ।।

बड़े जतन से रहे गूंधते
हम अपने कर्मों की माटी
किन्तु टूट पायी कब हम से
युग युग की जर्जर परिपाटी ।
बहुत प्रयास किया हम ने
कर ही डालें अपना मनचीता
लगता परिवार जैसा चाहा था वैसा काम नहीं बन पाया ।
आत्मा का सम्बंध किन्तु पथ का आयाम नहीं बन पाया ।।
————————————–डॉ. रंजना वर्मा

         

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