माधुरी गन्ध की वो छुअन

माधुरी गन्ध की, वो छुअन क्या मिली,
सुप्त वीणा हँसी, सुर सजाने लगी।
नाचने लग गईं तितलियाँ बाग में,
टोली भौंरों की, जब गुनगुनाने लगी।

सूनी आँखों में, फिर ख़्वाब सजने लगे,
हर तरफ, प्रीति के साज बजने लगे।
साँझ के नैन, झुकने लगे लाज से,
चाँदनी देखकर, खिलखिलाने लगी।

थी गली एक, सुनसान – बैरागिनी, नेह दीपक लिए, आ गई यामिनी। रौशनी के खजाने लुटाती हुई, यह अमावस, दीवाली मनाने लगी।

द्वार पर कोई दस्तक, सफल हो गई,
चेष्टा चेतना की, चपल हो गई। सज गईं कोपालें, फिर ‘विकल’ शाख पर,
कामना, सिर से घूँघट हटाने लगी।
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० डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’

         

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