मुक्त हो गए तुम बंधन से

मुक्त हो गए तुम बंधन से , त्याग दिया संसार |
भूल नहीं पाया मैं अब तक , मीत तुम्हारा प्यार |
***
सुधियों के सागर के जल में , जब जब फेंकूं कंकर |
बना तरंगों का घेरा तब ,उठती लहर भयंकर |
नागिन सी डस लेती यादें , कभी खुशी दे जातीं,
पिया विरह का गरल बना मैं , बेबस होकर शंकर |
अब भी ऐसा लगता तुम बिन ,है जीना बेकार |
भूल नहीं पाया मैं अब तक ,मीत तुम्हारा प्यार |
***
आभारी हूँ मुझे सिखाया ,पाठ प्यार का पहला |
खोल दिया ज्यों द्वार स्वर्ग का , सुंदर और सुनहला |
निपट अनाड़ी को तुमने दी , प्रीत रीत की दीक्षा ,
धीरे धीरे पार किया था , प्रेम का हर मरहला |
चुका नहीं पाया ऋण अपना ,प्रियतम रहा उधार |
भूल नहीं पाया मैं अब तक , मीत तुम्हारा प्यार |
***
जीवन में कुछ लोग अचानक , राहों में मिल जाते |
आकर जीवन में छोटा सा , हिस्सा बनकर छाते |
उनके आने से मिल जाते , कुछ पल तो राहत के
अंधकार में ज्योत जलाकर , उजियारा फैलाते |
तुम भी शामिल थे उनमें जो , कर जाते उपकार |
भूल नहीं पाया मैं अब तक , मीत तुम्हारा प्यार |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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