“मुहब्बत की नहीं मुझसे “

एक गीत प्रीत का
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“मुहब्बत की नहीं मुझसे ” , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |
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लता के सम लिपट जाना , नखों से पीठ खुजलाना |
अधर से चूम लेना मुख,नयन से कुछ कहा जाना |
कभी पहना दिया हमदम,गले में हार बाहों का
अचानक गोद में लेकर,तुम्हारा केश सहलाना |
हथेली से छुपा लेना, तुम्हारा नैन को मेरे
इशारे प्यार के थे या, शरारत भेद यह खोलो |
“मुहब्बत की नहीं मुझसे ” , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |
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तुम्हारा डाँटना या फिर ,तुम्हारी झिड़कियाँ मीठी |
ज़रा सी बात पर आँसू , बहाने के बहाने भी |
तुम्हारा हक़ जताना भी ,तुम्हारी ज़िद सभी नखरे
बताओ किस तरह मानूं ,अदाओं की कलाबाज़ी |
बुने जो ख़्वाब थे हमने ,हमारे आशियाने के
प्रिये ! बरखा बिना संभव ,कभी क्या बीज भी बो लो |
“मुहब्बत की नहीं मुझसे ” , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |
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कठिन होगा तुम्हारे बिन ,सनम हर हाल में जीना |
जुदाई का हलाहल भी ,बड़ा मुश्किल यहाँ पीना |
तुम्हीं ने डोर बाँधी थी ,तुम्हीं ने तोड़ क्यों डाली ?
अचानक क्यों मुझे जो हक़, दिया था प्रीत का छीना ?
प्रतीक्षारत रहूँगा मैं , अभी तक आस है बाकी
क़सम है लौट आओ तुम ,न जीवन में ज़हर घोलो |
“मुहब्बत की नहीं मुझसे ” , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |

         

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