“वो टेसू के फूल तुम्हारे”

वो मधुरिम मधुमास सलोना,
पुष्प खिले थे डाली-डाली।
ललित-पल्लवित वन-उपवन थे,
चहुँ और बिखरी हरियाली।

कोयल भी नित दोहराती थी,
वो सुमधुर से गीत हमारे।।
इस जीवन को महकाते हैं,
वो टेसू के फूल तुम्हारे।।

जुगनू की झिलमिल सी टोली,
निर्मल सी बहती जल-धारा।
शीतल-शीतल पवन के झोंके,
सुरभित-कुसुमित नदी-किनारा।

स्वप्निल सी थी निशा अनोखी,
टिमटिम करते चाँद-सितारे।।
इस जीवन को महकाते हैं,
वो टेसू के फूल तुम्हारे।।

स्मृतियों की इक किताब में,
अब तक मैंने रखे सहेजे।
अपनी प्रीत-पत्रिका में रख,
तुमनें हर बसंत जो भेजे।

मुस्काते हैं हर पन्ने पर,
और मुझे हैं सबसे प्यारे।।
इस जीवन को महकाते हैं,
वो टेसू के फूल तुम्हारे।।

अर्चना सिंह✍

         

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