“वो हसीना”…

“ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…
क़ुदरत ने क़रीने से रचा है वो नग़ीना…!
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सुन्दरता में वो ग़ुलों को मात दे-दे ,
आँखों में बसकर ख़ूबसूरत हालात् दे-दे !
ज़हां में ढूंढा तो देखा और कहीं ना…
ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…!!
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जो बोल उठे तो बस वक़्त थम जाये ,
हर लफ़्ज़ में मानो शेर समाये …!
उसके बग़ैर शब्द कहीं जमी ना…
ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…!!
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हँसी में उसकी मनमोहक है अदा…
मिलकर उससे ग़म दूर हो जाते हैं सदा !
गालों के डिंपल से ध्यान कभी हटी ना …
ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…!!
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ज़िक़्र किसी का हो बेबाक राय मिल जाता…
खरी-खरी बोलने का अभिप्राय मिल जाता…!
सबको तोलने का अंदाज है क़रीना…
ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…!!
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“कृष्णा” जीना चाहता है उसके संग-संग…
जीने का अन्दाज उसका है ख़ूब पसंद…!
भूलकर भी उससे ज़ुदाई की बात कही ना…
ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…!!
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ज़ेहन में बस गई है वो हसीना…
कुदरत ने क़रीने से रचा है वो नगीना…!”
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