“हम-तुम”…

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सुनो साथी , एक नदी के दो किनारे हैं हम-तुम ।
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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कुछ आगे जब तुम निकले तो कुछ आगे हम निकले ,
मिले जब हम-तुम तो आहिस्ता से सभी ग़म निकले ।
विधाता से मिले ख़ूबसूरत इशारे हैं हम-तुम ,
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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मेरी आँखों में पढ़ोगी तब ये जान जाओगी ,
है कितनी गहराई प्रीत में ये मान जाओगी ।
एक-एक पल न जाने कैसे गुजारे हैं हम-तुम ?
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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कैसी ये प्यास है , कैसी है ये ख़्वाहिश अधूरी ?
लब खिल जाए , सोच हमारी हो जाए जो पूरी ।
मंज़िल की तलाश में निकले बनजारे हैं हम-तुम ,
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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वफ़ा की मिसाल देखना चाहो तो देख लो इधर ,
कोई दास्तां भी लिखना चाहो तो लिख लो इधर ।
प्रीत के आसमां के चमकते सितारे हैं हम-तुम ,
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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सुनो साथी , एक नदी के दो किनारे हैं हम-तुम ।
सच कहें तो एक-दूसरे के सहारे हैं हम-तुम ।।
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— °•K.S. PATEL•°
( 21/12/2018 )

         

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