“क्यों है इंसान”…

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जिसे पाना चाहता , उससे दूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही , इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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रब ने कुछ सोच-समझकर इंसान बनाया होगा ,
प्रीत बाँटेगा ये सोच दुनिया में लाया होगा ।
मगर दिल तोड़ने के लिए मशहूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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इक राह के मुसाफ़िर वैसे तो कम मिल पाते हैं ,
बहुत कम हैं जो उलझनें साथ मिलकर सुलझाते हैं ।
दो कदम चलकर थमने का दस्तूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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आँसुओं की बूँद में तस्वीर छुपाना आसां नहीं ,
बड़ी मुश्किल है देख पाना कि कौन परेशां नहीं ।
किसी के वास्ते बन जाता सरूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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उम्र कट जाती अक्सर इक ख़्वाहिश के इंतज़ार में ,
चेहरा भले बदल जाता है वक़्त के रफ़्तार में ।
मगर चाहत में उलझ एक क़सूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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दिले-मरहूम को ऐ ख़ुदा ज़रा बख़्श दो यहाँ पर ,
वो खुश रहे सदा , उसे खुशियाँ मिल जाए जहाँ पर ।
दर्द जमा करके “कृष्णा” मजदूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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जिसे पाना चाहता , उससे दूर क्यों है इंसान ?
दिल के हाथों ही इतना मज़बूर क्यों है इंसान ??
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— °•K.S. PATEL•°
( 22/02/2019 )

         

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