दरकती रूह के जज़्बात

दरकती रूह के अनकहे जज़्बात

दरकती रूह है,और इश्क की मीनारें हैं।
चलो जो तुम तो, सफर की ही सरोकारें हैं।
बिन तेरे चैन कहाँ, कैसे सफर हम ये करें।
हमको हर वक्त तेरे , प्यार की दरकारें हैं।

तुमको दिल में पनाह देके, क्या गुनाह किया।
बसाया नजरों में, तुझे ही आफताब किया।
तेरे ख्वाबों में क्यों, दिल ये टूट कर है जिया।
क्यों ये जिंदगी सिर्फ , अश्क की बौछारें हैं।

थामकर बाहों को तेरी, सफर हम भी करें।
उतर के रूह में, दो चार कदम साथ चलें।
दुनिया है एक महल,आसमाँ के जिसके चले।
दिखे न चारों तरफ, कैसी ये दीवारें हैं।

वफा के नाम पे,मुझको वेबफाई दी।
चले न साथ, मंजिलों की भी दुहाई दी।
मैं कितना रोकती, तुम चलते गये चलते गये।
मिले न तुम, यूं तो दीवानों की कतारें हैं।
ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

         

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