नहीं पास रहता है कोई

नहीं पास रहता है कोई
फिर भी आहट कैसी है.
सखी ज़रा बतलाओ मन में
ये घबराहट कैसी है.

क्यों लगता है चुप चुप आया,कोई मन के अब द्वारे.
कब कैसे अनजाने अपना,ह्रदय लग रहा ये हारे.
नयन बड़े बेचैन निरंतर
बाट जोहते क्यों किस की,
यौवन में क्या होता ऐसा
दिन में दिखते हैं तारे.

कहूँ भी क्या कहते न बनता
ये अकुलाहट कैसी है.

सखी ज़रा बतलाओ……..

मन अनमना रहे हर पल अब ,भाती कोई बात नहीं.
क्या बोलूं मेरे बस में जब ,कोई भी जज़्बात नहीं.
जी करता है बैठ अकेले
ख़ुद से केवल बात करूँ,
हुआ मुझे क्या अब तक कोई
कारण मुझको ज्ञात नहीं.

खीझ रहा खुद पर ही मन की
ये झल्लाहट कैसी है.

सखी ज़रा बतलाओ……..

कंगन भी चुप हुआ आजकल,पायल गीत न गाती है.
नींद हुई बैरन है रातें ,आँखों में कट जाती हैं.
तकिया बना सहारा केवल
चाँद रात भर का साथी,
करवट बदलूँ इधर उधर मैं
याद किसी की आती है.
अन्तस एक अगन मिलने की
ये उकसाहट कैसी है.

सखी ज़रा बतलाओ……..
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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