“निकल गये”…

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जाने क्या ख़्वाब देखे , ज़ेहन में क्या-क्या पल गये ?
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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हर लम्हें में कुछ न कुछ पाने की ज़रूर आस थी ,
खुशियों की सभी चाबी मानो अपने ही पास थी ।
मगर अहसास और उम्र मिलकर जाने क्यों छल गये ,
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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इक ख़्वाब की तलाश में ज़िंदगी को मनाने निकले ,
छाई धुंध ज़िंदगी के कदमों से हटाने निकले ।
और इस क़श्मक़श में ज़हान के अनुसार ढल गये ,
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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चारों तरफ़ नज़र आया अज़ीबोगरीब खेल था ,
खुश थे सभी मगर आपस में नहीं कोई मेल था ।
बहुत बुरा लगा जब खोटे सिक्के भी अब चल गये ,
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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दूजों को सुधारना बड़ा मुश्किल काम जान लिया ,
कहीं न कहीं ख़ुद की है गलती , ये अभी मान लिया ।
“कृष्णा” के लड़खड़ाते कदम अब ज़रा सम्हल गये ,
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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जाने क्या ख़्वाब देखे , ज़ेहन में क्या-क्या पल गये ?
कुछ अच्छा कुछ बुरा , दोनों अश्क़ बनकर निकल गये ।।
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— °•K. S. PATEL•°
( 28/08/2018 )

         

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