फिर सियासत ने भूख छीनी है …..

फिर सियासत नें भूख छीनी है
फिर से चादर ये झीनी ,झीनी है
क्यूं नही आता है तरस हम पर,
जिन्दगी क्यूं ये पानी , पानी है ………फिर सियासत …….

काला धन कौन ले के आयेगा
भूख ना कोई बांट पायेगा
जिनके घर में है नोटों के बोरे
उनके पास एक नई कहानी है ……….फिर सियासत …….

बैंक की लम्बी लगी कतारें
भूख से रोतीं घर की दीवारें
कोई नही आया देखनें अब तक
कितनी हो गई खत्म जवानी है ……………फिर सियासत ………..

तेरे ही घर में चोर निकले है
देखकर रंग नया फिसलें है
किसी की खुशीयाँ लूटी है दिन में
किसी की रौनके दीवानी है ……………फिर सियासत ने ……….

मै तो जनता की बात करता हूँ
हाँ बगावत की बात करता हूँ
सच कहनें से कैसा डर “सागर”
चढादो सूली जिसे चढानी है
फिर सियासत ने भूख छीनी है !!
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मूल रचनाकार …….
डाँ. नरेश कुमार “सागर”

         

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