सजना तुम ना आये

बरखा की रुत आई फिर से
सजना तुम ना आये |
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रातें तो बैरन पहले से
दिन अब हुए पराये |
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याद आज भी प्रथम मिलन की
पहली बरखा आती |
कड़की बिजली लिपट विटप से
एक लता शर्माती |
धड़का था दिल तब जोरों से
गूंज आज भी मन में |
झंकृत तार हुए वीणा के
पुलकित सिहरित तन में |
हाय ! दिवस वह मुझे आज भी
भूले नहीं भुलाये |
रातें तो बैरन पहले से
दिन अब हुए पराये |
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बरखा की रुत आई फिर से
सजना तुम ना आये |
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टपटप टपटप बूँदे बरसे
लगती कोलाहल-सी |
इधर उधर डोलूं सावन में
जैसे मैं पागल-सी |
रूठे हैं घुँघरू पायल के
राग न छेड़े तुम बिन |
कंगन भी चुप रहते हैं अब
बीते कितने ही दिन |
घोर अकेलापन फिर बरखा
मन में अगन लगाये |
रातें तो बैरन पहले से
दिन अब हुए पराये |
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बरखा की रुत आई फिर से
सजना तुम ना आये |
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अगली बारिश तक आ जाना
यही निवेदन करती |
बनी सुहागिन इसी आस में
एक एक दिन गिनती |
सपनों के आँगन में देखूं
नित्य तुम्हारी काया |
छू लूँ तो गायब हो जाती
मीत तुम्हारी छाया |
जागूँ तो आते अधरों पर
गीत संग जो गाये |
रातें तो बैरन पहले से
दिन अब हुए पराये |
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बरखा की रुत आई फिर से
सजना तुम ना आये |
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रातें तो बैरन पहले से
दिन अब हुए पराये |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |

         

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