अंगार लिखूँगी गजलों में

कब तक मैं श्रृंगार लिखूंगी,प्यार लिखूँगी गजलों में
बहुत सिया का दाह हुआ,अब वार लिखूँगी गजलों में ।।

तुमने अपने हित की ख़ातिर ,बस मेरा उपयोग किया
एक बेजानी चीज़ बनाकर,हर पल ही उपभोग किया
बनकर फूल बहुत महकी,अब खार लिखूँगी गजलों में
बहुत ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

जब हम धरती पर आए थे,तुमने नाक सिकोड़ा था
सर का बोझ समझ कर मुझको,मुझसे रिश्ता तोड़ा था
कर्तव्य समझ सब सुख त्यागा,अधिकार लिखूँगी गजलों में
बहुत ,,,,,,,,,,,,,,,,

जिस कोख़ से पैदा होते हो,उसका ही धंधा करते हो
पवित्र राम की भूमि को कुकर्म से गन्दा करते हो
झूठी,दम्भी पुरुषार्थ के ऊपर,धिक्कार लिखूँगी गजलों में
बहुत,,,,,,,,,,,,,,,,,

बन शक्ति मैं साथ खड़ी हूँ, हर कीमत हर हाली में
अनुपम सुख की अनुभूति हूँ, मैं तेरी बदहाली में
बिना स्वरा के पूर्ण नहीं तुम,ये सार लिखूँगी गजलों में
बहुत ,,,,,,,,,,,,,,,,,

स्वराक्षी स्वरा
खगड़िया बिहार
9576891908

         

Share: