आओ मेघा प्यास बुझाओ

गीत
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आओ मेघा प्यास बुझाओ धरती तरस रही है ।
धरा सुतों की घोर निराशा छल छल बरस रही है ।।

अम्बर में है सूरज तपता
धरती तवा बनी है
ग्रीष्म तपन में जाने कैसी
ये तक़रार ठनी है ?

विकल हुई देखो वसुधा जो अब तक सरस रही हैं ।
धरा सुतों की घोर निराशा छल छल बरस रही है ।।

पशु प्यासे तप रहे धूप में
चिड़िया हाँफ रही है ,
कैसे जीवन बच पाये यह
दुविधा काँप रही है ।

शीतल जल की विकल चाह में गैया भटक रही है ।
धरा सुतों की घोर निराशा छल छल बरस रही है ।।

अपने ही कर्मों का प्रतिफल
मानव भोग रहा है ,
करता नित्य उपेक्षा तरु की
अपना रोग रहा है ।

अनाचार से मिलती पीड़ा भी कब सहज रही है ।
धरा सुतों की घोर निराशा छल छल बरस रही है ।।

———–  गीत ( संदेशात्मक ) – डॉ. रंजना वर्मा

         

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