इस पर करो विचार

कितने दिल के अरमां टूटे ,
कितनी अँखियाँ तरसी ।
सावन के मौसम मे भोले ,
क्यों न बूंदे बरसी ।।
थोड़ा इस पर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।
थोड़ा इसपर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।।१||

पिछले दशक में इसी माह में ,
खूबई बरसा होती ।
आज का मानव देख के नदियां ,
अपने हाल पे रोती ।।
थोड़ा इसपर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।
थोड़ा इसपर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।।२||

जंगल से अब पेड़ चुराते ,
और नदियों से रेता ।
धरती माता कह रई सबसे ,
बच के रईयो बेटा ।
ने तो हो जाए बंटाढार ,
थोड़ा इसपर करो विचार ।
हो रही है क्यों हाहाकार
थोड़ा इसपर करो विचार ।।३||

हे शिवशंकर , औगड़दानी ,
करियो मेहरबानी ।
फसल खराब न हो पाए ,
तुम गिरबा दइयो पानी ।।
थोड़ा इसपर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।
थोड़ा इसपर करो विचार
हो रही है क्यों हाहाकार ।।४||

हे महाकाल सबकी विनती ,
तुम पल मे करते पूरी ।
फिर “साहिल ” की इ्च्छा ,
बोलो कैसे रहे अधूरी ।।
सबके खुशी रहे परिवार ,
थोड़ा इसपर करो विचार ।
हो रही है क्यों हाहाकार
थोड़ा इसपर करो विचार ।।५||

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

Share: