“उदासी कैसी…?”

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बेवज़ह की ये दिल पे छाई है उदासी कैसी ?
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।
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सभी उम्र में एक अदद ख़ूबसूरती होती है ,
मगर बीते दौर की भला कहाँ पूर्ति होती है ?
हर्ष न रहे , सोच रह जायेगी वैसी की वैसी ,
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।
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क्या अपना दिल कहता , बिंदास होकर बस कर डालो ,
सभी हसरत को एक-एक करके बाहर निकालो ।
दुनिया में कुछ सुंदर नहीं अपनी अस्तित्व जैसी ,
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।
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कोई ग़म नहीं जो शरीर से थोड़ा सुंदर नहीं ,
पर क्या सुंदरता हर किसी के मन के अंदर नहीं ?
छल-कपट से परे हो और हो मासूमियत ऐसी ,
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।
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तनाव-मुक्त होकर अब जीना है बेहद ज़रूरी ,
अनावश्यक-अनर्गल विचारों से बना लो दूरी ।
जीवन में ऐ “कृष्णा” बाधाएँ हैं कैसी-कैसी ?
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।
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बेवज़ह की ये दिल पे छाई है उदासी कैसी ?
उमंग से बढ़कर जीवन में नहीं कोई हितैषी ।।

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— °•K.S. PATEL•°
( 19/09/2018 )

         

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