कविता तो कविता होगी

जो आँख शुष्क है सदियों से अब उनमें भी सरिता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

तुलसी केशव कालिदास सा कोई ज्ञान नही होगा
रक्त पिपासा का कविता में कोई स्थान नही होगा
मानव उर की पीड़ा के संग माँ की भी ममता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

मीरा के छंदो सी बंधों सी कुछ तो करुणा होगी
मोहन की मूरत सी उसमें प्यारी सी तरूणा होगी
सच की कविता के सम्मुख, उसमें कुछ मृदुता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

ताकत के मद भूल गये जो धर्म प्रजा की बोली को
मजहब की तलवारों से जो रोज खेलते होली को
कविता उनको ललकारेगी जिनकी अक्षम्य खता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

मानवता के उपवन में ,उन्माद जगाने वालों को
स्वेत वस्त्र धरण पर उर से गंदे व कुछ कालो को
सच कहता हूँ काव्य धार में उनके प्रति कटुता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

दिनकर पंत निराला जैसी उसमे एक चमक होगी
मानवता पूजेगी जिसको वैसी एक खनक होगी
लेकिन कविता को मानव की पीड़ा खूब पता होगी
दरबारी कोई गीत नही बस कविता तो कविता होगी

ऋषभ तोमर

         

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