झोंपडी और महल

गीत
——
जब यह दुनियाँ वसुधा अंचल में सोती है ।
तब झोंपड़ियों से लिपट चाँदनी रोती है ।।

क्यों ताजमहल से महल बनाये हैं जग ने
क्यों प्रासादों में सुंदरता सरसायी है ?
महलों के ऊँचे शिखरों के नीचे ही क्यों
फिर दीन हीन झोंपडियाँ गयीं बनायी है ?

रजनी की इन तम भरी भयानकताओं में
ये महल दुमहले या कि झोंपड़ी सोती है ।
इन झोंपड़ियों से लिपट चाँदनी रोती है ।।

जो ऊँचे ऊँचे प्रासादों के निर्माता
क्यों उनकी किस्मत में ये टूटी छानी है ?
क्यों जिसने मिट्टी को सांचों में ढाला है
उसके जीवन की ऐसी अकथ कहानी है ?

उनकी पीड़ा पहचानी है इन रातों ने
जिनकी आँखों से गिरे सुमन पर मोती हैं ।
इन झोंपड़ियों से लिपट चाँदनी रोती है ।।

सूरज समता से है प्रकाश देता सब को
तरु देते हैं सब को समान फल औ छाया ।
रजनी सब को अपने आँचल में लेती है
नीरद ने सब के ही आँगन जल बरसाया ।

क्यों छोटे बड़े धनी निर्धन के मापों में
महलों झोंपड़ियों बीच विषमता होती है ।
इन झोंपड़ियों से लिपट चाँदनी रोती है ।।

पोंछा करती हैं शशि किरणें दुख के आँसू
धनिकों को भी थोड़ी शीतलता देती हैं ।
जल थल का अंतर नहीं उन्हें विचलित करता
दे कर शीतलता उष्ण ताप हर लेती हैं ।

क्यों ऊँच नीच की खींची हुई हैं दीवारें
जो वैमनस्य का बीज हृदय में बोती हैं ।
इन झोंपड़ियों से लिपट चाँदनी रोती है ।।
———————-डॉ. रंजना वर्मा

         

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