निचोड़

एक गीत देखिएगा दोस्तो

धीरे-धीरे खुद को जैसे पा रहा हूँ ..
ज़िन्दगी को गुनगुनाता जा रहा हूँ ….
शुष्क शोषित भावनाओ की जहाँ परछाई देखी !
बुझ रहे दीपों की जब भी सिसकती रानाई देखी !!
खो गए विश्वास की जब बेतरहा ढूढ़वाई देखी !!!
भावना के बादलों को उर संजोये
तप्त हृदयों पे बरसता जा रहा हूँ …
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………

ठीक है गम साथ में बेहद रहे जीवन में मेरे !
ठीक है समझा न उनने जो बसे थे मन में मेरे !!
ढेर सी रंगत मिली पर ईश से आँगन में मेरे !!!
ये गजब अहो भाव, थकने नहीं देते
इनको समझा जितना वो समझा रहा हूँ ….
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………

राहबर कितने गजब जो राह में हमको मिले थे !
बंट गया था दर्द सब , यूँ बांटते हमसे चले थे !!
सब शिकायत मिट गई बच पाए न मन के गिले थे !!!
राह में जो छांह ठंडी पाई जिनसे ,
उन शज़र को याद कर इतरा रहा हूँ ….
ज़िन्दगी को गुनगुनाता …..

चाह मंजिल की मुसलसल देख ,अपनी और खींचे !
बच सकूं ठोकर से सो मैं , चल रहा कर नज़र नीचे ..
लक्ष्य है संज्ञात गोकि दिख रहा हूँ आँख मीचे !!
थक नहीं सकता मुझे मंजिल बुलाती,
हाँ जरा सी देर बस सुस्ता रहा हूँ …
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………

तुम कहो तखलीफ़ बिन किसको कभी खुशियाँ मिलीं हैं ?
शूल की तखलीफ़ बिन माली को कब कलियाँ मिलीं हैं ??
नूर देने के लिए शम्मा ही तो पहले जलीं हैं !!
हर पथिक के भाग्य में ठोकर लिखी है,
चल रहा हूँ और ठोकर खा रहा हूँ …..

ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………
प्यार की मनुहार की बातें बहुत सी कह चुके हैं !
चांदनी में भीगती रातें बहुत सी कह चुके हैं !!
तीरगी की नूर से घातें बहुत सी कह चुके हैं !!!
कह चुके हैं ढेर सी फिर क्या कहें हम ,
बस पुरानी बात ही दुहरा रहा हूँ ……
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ……..
.
सोचना कुछ अलग तेरा और कुछ मेरा अलग है !
ख्वाब तेरे दूसरे कुछ औ मेरा सपना अलग है !!
फ़लसफ़ा कुछ अलग तेरा और मानना मेरा अलग है !!!
मंजिलों के फर्क से ही हो गई हैं ,
अलहदा राहें ! यही बतला रहा हूँ ….
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………

आये थे जब हम अकेले , जायेंगे भी हम अकेले !
अपने अपने नज़रिए के ,पाल रख्खे हैं झमेले !!
क्या पता कब तक चलेंगे ,साथ में दुनिया के मेले !!!
रूह की आवाज को सुनता हुआ मैं,
मस्त होकर गीत उसका गा रहा हूँ …..
ज़िन्दगी को गुनगुनाता ………

“सुधीर”

         

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