“बाधाएँ आती हैं आयें”

राही को बढ़ते जाना है,
बाधाएँ आती हैं आयें।।

जान रहा है राही,चलना,
उसके जीवन की नियती है।
उसके पाँव के छाले जानें,
क्या उसके ऊपर बीती है।

धूमिल और पथरीली राहें,
पग-पग पर रोड़े अटकायें।।

दूर है मंजिल,लंबा रास्ता,
आसमान से अग्नी बरसे।
थकी देह है,सूखी आँखें,
और कंठ पानी को तरसे।

सीख रहा है राही कैसे,
बाधाओं से हिम्मत पायें।।

दृण निश्चय की गठरी बाँधे,
चला जा रहा सधे पाँव से।
कहाँ धूप से उसको पीड़ा,
कहाँ प्रेम है उसे छाव से।

जीत गये जो अपने मन को,
विजय-पताका को फहरायें।।

अर्चना सिंह

         

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