मन के खेल

मन का ओर न छोर..।
बावरे मन का ओर न छोर….।।
कभी कहे इस ओर चला चल,
कभी कहे उस ओर..।
बावरे ,मन का ओर न छोर।।

रंगबिरंगी उड़ें पतंगे
हैं रंगबिरंगी डोर..।
विचलित चित्त करेगीं इक दिन
आज दिखें चितचोर..।।
बावरे, मन का ओर न छोर..।।

सहज राह से बचने कहता
ये जालिम मुँहजोर..।
बहुत हुआ कब समझेगा तू
इसकी बाँह मरोड़..।।
बावरे ,मन का ओर न छोर..।।

छलिया है स्वभाव मूलतः
घूमें चेहरे ओढ !
जाना था किस ओर मगर ये
ले जाता किस ओर!!
बावरे, मन का ओर न छोर।।

आत्ममुग्ध बुद्धि को करता
खुद पे करे विभोर !
शातिर है ,ताकत है इसमें
न समझो कमजोर!!
बावरे ,मन का ओर न छोर !!

सुख दुख दोनो जीवन रस हैं
क्यों करनी फिर होड़..।
जो पाया स्वीकार करें हम
उत्तम भाव विभोर ..।।
बावरे ,मन का ओर न छोर..।।

मन का ओर न छोर !
बावरे मन का ओर न छोर।
कभी कहे इस ओर सही है
कभी कहे उस ओर!!

सुधीर

         

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