“संस्कार”…

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ये इंसान इस धरा का ख़ूबसूरत चित्रकार है ।
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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ये आधुनिकीकरण का देखो विस्तार है कैसा ?
अलग-अलग विचारों का देखो भरमार है कैसा ?
हर तरफ नज़र आता दुष्परिणाम का भरमार है ,
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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संस्कार बनता है जान लो अपने ही स्वभाव से ,
यदि चाहें तो हम निखर सकते हैं अभाव से ।
क्षणिक लाभ के लिए दर-दर की भटकन बेकार है ,
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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माता-पिता के कर्ज़ को हम चुका ही नहीं सकते ,
कितने दिये हैं ये बलिदान , भुला ही नहीं सकते ।
फिर अंतिम पड़ाव में मिल जाता क्यों तिरस्कार है ?
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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मानवीय मूल्यों को इस कदर भुलाना ठीक नहीं ,
अब रिश्तों के प्रति अव्यावहारिक होना ठीक नहीं ।
सुकूं पाने का एकमात्र साधन परोपकार है ,
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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धूमिल हो रहे संस्कृति को बचाना ज़रूरी है ,
जमी हुई मानसिक विकृति को हटाना ज़रूरी है ।
सार्थक ज्ञान के अभाव में जीना क्या स्वीकार है ?
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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ये इंसान इस धरा का ख़ूबसूरत चित्रकार है ।
मगर न जाने क्यों इंसान भूल गया संस्कार है ??
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— °•K.S. PATEL•°
( 02/11/2018 )

         

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