ख़ुद को ज़िंदा रखना है तो पेड़ बचाओ

ख़ुद को ज़िंदा रखना है तो
बीजो पेड़ बचाओ बाग़ |
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क़ुदरत के भंडारों को जब
मानव करता अति दोहन |
काट गले पेड़ों के कब तक
क़ायम रक्खोगे जीवन |
धरती की छाती में मानव
छेद करोगे तुम कितने ,
रोको जल्द धरा का इतना
ठीक नहीं है उत्पीड़न |
क़दम उठा लो ठीक समय पर
वरना और बढ़ेगी आग |
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ख़ुद को ज़िंदा रखना …….
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वक़्त नहीं है सोचो अब यह
क्या करना क्या नहिं करना |
एक मन्त्र ही बचा ध्यान सब
केवल इस पर ही धरना |
जितने काटो उससे दुगुने
पेड़ लगाना धरती पर ,
और सुरक्षा उनकी पक्की
नीर खाद देकर रखना |
बहुत सो लिया पर्यावरण हित
जल्दी से रे ! मानव जाग |
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ख़ुद को ज़िंदा रखना …….
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धूल धूम्र के नभ पर बादल
देखे तुमने जो छाते |
नष्ट हुए जो पेड़ काल बन
वही हवा में मँडराते |
चीत्कारों से उनकी फटता
नहीं कलेजा क्या तेरा,
बचपन से ले वही मौत तक
साथ निभाते जो जाते |
सुख वैभव के फूल खिलाने
तो कर ले थोड़ा सा त्याग |
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ख़ुद को ज़िंदा रखना है तो
बीजो पेड़ बचाओ बाग़ |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
30 /03 /2018

         

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