परीक्षा , परख

परीक्षा /परख
जिंदगी एक परीक्षा
बदलती रही निष्ठा
राम राम कह रहे
रावन बन जीते ,

नवयुग की परख
धीरे धीरे ही सरक
कन्धा बना बेधड़क
स्वार्थी जीवन जीते ,

मीत मिले तो परख
गुरु बना वो मिथक
ज्ञान वान तो भटक
अज्ञानी ही तारते ,

बाबा बन संत बन
देश द्रोही कंठ कर
अंध भक्त बन कर
नवयुग बनाते ,
नवीन कुमार तिवारी ,अथर्व

         

Share: