साहित्यानिशासन

*साहित्यानुशासन*
आनन दर्प दीखते,कानन धूप घूमते ।
भानन झांझ लगते,सहिष्णु ही रहिये ।।

आसन सब करते , मधुर बोल बोलते।
विचार मिल सीखते, सहिष्णु से मिलिये ।।

देश उत्थान सोच हो, सब मिल विकास हो।
भाव सामान मान हो, सहिष्णु ही कहिये।।

सत्य कलम चलाते, विचार नहीं बेचते ।
साहित्यानुशासन से , सहिष्णु ही चाहिये ।।
*नवीन कुमार तिवारी, अथर्व*

         

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