कनक ,स्वर्ण

कनक से चमकते रहे, बढ़ते शायद भाव।
चमक उतार सिसक पड़े, दे गये सभी घाव।

कनक बने जो झूमते, बढ़ गया अंहकार ।
सपने सभी टूट गये , होते अब लाचार ।।

मोह माया दुर रहते ,तभी लगे संसार ।
मोहक जाल जब फसते , कहते हो व्यभिचार ।
नवीन कुमार तिवारी,

         

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