गंगा मैली कर रहा,मानव तेरी भूल।

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गंगा मैली कर रहा,मानव तेरी भूल।
गंगाजल बस जल नहीं,ये है जीवन मूल।।
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लगन ज़रूरी हर जगह,लगन कहाँ से लाय।
मिल जाए जो लगन तो,मानव बढ़ता जाए।।
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धीरज धरना सीख तू,धीरज सुख का मूल।
शूल मिटाकर राह के,धीरज देता फूल।।
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रिश्तों की देखी बहुत,हमने जग की रीत।
जगत स्वार्थी कौन है,यहाँ किसी का मीत।।
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माया भरमाए तुझे,न हो ऐसा ज़ेहन।
संतों जैसा मन बने,कर वो महान जतन।।
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साया सच्चाई बने,मेहनत बने बहन।
मानवता माता बने,’भवि’ कर ऐसा जतन।।

।।।शुचि(भवि)।।।

         

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