जिंदगी समानता

 

कुनबे में बसते रहे , दिखाया जो लकीर ।
अल्प लाभ लेकर भले ,बन जाइये फकीर।।

भाषायी विग्रह रखे ,बनाया जो दिवार ।
सत्ता केंद्र बना रहे ,पुराना था विकार ।।

छद्म विकास प्रदर्शनी , वोट बैंक शैतान ।
मुफ्त खोरों की एकता ,जन तंत्र हैरान ।

समानता की जिंदगी , रहे किताबी ज्ञान ।
गुलाम है मानसिकता, सामान मुफ्त ध्यान ।।

सत्ता रहे बिरादरी, हमारा खानदान ।
मन मोहक लाभ मिलते , करते सब मतदान ।।

पत्थर फेंकते रहते , चढ़ा रखे आस्तीन।
भोले नादान कहते,गद्दारों की शान ।।

नवीन कुमार तिवारी,,,

         

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