नारी पर व्यभिचार

अट्टहास क्रूर काल का ,सुनते कौन पुकार ।
सृजनकर्ता मार रखिये, सुने कहाँ चित्कार।।

माया मोह से बढ़ते , यौन तृष्णा विकार ।
धर्म पारायण बनके , किये मौन व्यभिचार ।।

अबला नारी सोचती, कहते जात बवाल ।
बेबसी पर चित्कारती,राज नीति कंगाल ।।

शक्ति वाहिनी देखिये , नारी विपत्ति काल ।।
नर भेष श्रृंगाल घुमे , पहन धर्म श्रृंगार ।।

धर्म जाति कुचक्र चलते, है राजनीति खेल ।
वहशी को फांसी मिले,कसते न्याय नकेल ।।
*नवीन कुमार तिवारी*

         

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