पगलपन

अवसाद

बरसे नयन टिपिर टिपिर, धुंन्धला आसमान ।
तरसे दरश मुकुल सजन , टूट रहे अरमान ।।

बोझिल होती जिंदगी ,अपने होते पास ।
मुस्कान की अवारगी कोई आता ख़ास ।।

खूबसूरती पर नजर, बनी रहे मुस्कान ।
जलजला सा असर हुआ ,चलता मेहरबान ।।

दीवाना पन जब चढ़े, हो जाता अवसाद।
मिले नहीं साजन कभी,गुलशन तब बरबाद ।।

अवसाद बने त्रासदी, चढ़ जाता जूनून ।
जीवन हन्ता बन चले, हर लेता कानून ।।
नवीन कुमार तिवारी,,,

         

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