पर्यवर्णीय

*पर्यवारण पर,,,*
परिकल्पना सोच रहे, श्रीजन कर उर द्वार ।
माता शारदे वर दे कलम नहीं व्यापार ।।

वृक्ष धरती सजाएगे ,पर्यावरणीय शान ।
प्राकृतिक उत्पीड़न से, बचे इंसान जान ।।

आई सुनामी सहसा , लेते कितने जान ।
प्रकृति का कोप सोचिए , प्रकृति सुधरे ज्ञान ।।

जलधारा क्यों भड़कते , तोड़ते नदी पाट।
रेत खनन जहां करते ,डूबते बड़े घाट ।।

सूरज जैसे तप चले , सूखे पानी घाट ।
मानव दानव बन चले, धरती पर यह भार ।।

बोया पेड़ बबूल का , आम कहां से पाए
पैरों में शूल चुभे ,सिर पकड़े अब रोए।।

उपवन-वन काटे चले, वृक्ष दिखे यही भान ।
इंसान के भीड़ बढ़े गगनचुंबी मकान।।

दोहन पर शोषण चले , अहंकार पर ध्यान ।
जल प्रबंधन भूल चुके, सूख खेत खलिहान।।

नवीन कुमार तिवारी अथर्व

         

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