पानी

देख सुरक्षित जल कहाँ , ठाकुर का वो कूप ।
नाले नदियाँ सूखती, दोहन करता भूप ।।

श्रमिक स्वेद जल कर रहा, उत्सर्जित यह धूप।
श्रम से जल वे सींचते, सुखसे रहता भूप ।।

बोतल पानी बेचते, केवल आज रसूख ।
जीव जंतु सब मर रहे, स्रोत नीर गय सूख।।

मानसरोवर घूमते , ढूंढत सुख अरु चैन ।
पानी में डुबकी लगा, छिनते मनकी चैन।।
*नवीन कुमार तिवारी*

         

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